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Friday, May 4, 2018

Justice R K. Agrawal says, independence of the Judiciary One of the foundations of democracy । न्यायपालिका की स्वतंत्रता लोकतंत्र की बुनियाद में से एक : न्यायमूर्ति आर के अग्रवाल

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नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट के निवर्तमान न्यायाधीश आर के अग्रवाल ने शुक्रवार को कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता लोकतंत्र की बुनियाद में से एक है और बार की स्वतंत्रता न्यायपालिका की स्वतंत्रता की पूर्व शर्त है. न्यायमूर्ति अग्रवाल सुप्रीम कोर्ट में चार साल के कार्यकाल के बाद शुक्रवार (4 अप्रैल) सेवानिवृत्त हुए. उन्होंने कहा कि स्वतंत्र समाज के लिये बार और बेंच अपरिहार्य हैं. न्यायमूर्ति अग्रवाल ने कहा , ‘‘ न्यायपालिका की स्वतंत्रता लोकतंत्र की बुनियाद में से एक है और वकीलों ने लोकतंत्र के स्तंभ को कायम रखने के लिये कठोर प्रयास किया है. बार की स्वतंत्रता न्यायपालिका की स्वतंत्रता की पूर्व शर्त है , जिसके जरिये अगर जरूरत पड़ी तो उनकी स्वतंत्रता का समर्थन किया जा सकता है. ’’ उन्होंने सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन द्वारा आयोजित कार्यक्रम में अपने विदाई भाषण में यह बात कही.


प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने आज कहा कि न्यायाधीशों का यह कर्तव्य है कि वे वकीलों के प्रति सम्मान दिखाएं , भले ही उनकी आयु या दर्जा कुछ भी हो. न्यायमूर्ति मिश्रा कार्यक्रम में मुख्य अतिथि थे. उन्होंने कहा , ‘‘ सुप्रीम कोर्ट एक है. बार हमें प्रोत्साहित करता है और हर मौके पर हमने बार के युवा सदस्यों से कहा है कि वे मार्गदर्शक फरिश्ता बनें. यह उम्र नहीं बल्कि बार में प्रवेश आपको महत्वपूर्ण बनाता है. आपका चाहे कोई भी कद या दर्जा हो , आप सम्मान के हकदार हैं और यह न्यायाधीशों का कर्तव्य है कि वे बार के सदस्यों के प्रति सम्मान प्रकट करें , भले ही उनकी उम्र या दर्जा कुछ भी हो. ’’ 


न्यायमूर्ति अग्रवाल पर प्रधान न्यायाधीश ने कहा , ‘‘ वह एक काम से मुक्त हो रहे हैं --- अगर आप ईर्ष्या महसूस कर रहे हैं तो आप उनका बहिष्कार कर रहे हैं. अगर आप उद्विग्न हैं तो आप उन्हें काम करने के लिये पांच साल और दे दें. कब , कहां और कैसे , मैं नहीं कह सकता. ’’ उन्होंने कहा , ‘‘ लेकिन अगर यह बार की इच्छा है तो आपको जरूर मिलेगा. मैं इसे बार की ओर से सहमति मानता हूं कि आप उन्हें कहीं और देखना चाहते हैं. मुझे उम्मीद है कि इसमें कोई असहमति नहीं है. ’’ 


न्यायमूर्ति अग्रवाल उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं. उन्हें 17 फरवरी 2014 को शीर्ष अदालत के न्यायाधीश के तौर पर शपथ दिलाई गई थी. न्यायमूर्ति अग्रवाल ने कहा कि युवा वकील ‘‘ कानूनी वातावरण की ऑक्सीजन हैं. ’’ उन्होंने कहा , ‘‘ अगर हम उन्हें ड्राफ्ट करने और दलील पेश करने का उचित मौका देते हैं तो यह उन्हें अधिक जिम्मेदारियां लेने में सक्षम बनाएगा. युवा वकील कानूनी वातावरण की ऑक्सीजन हैं. ’’ न्यायमूर्ति अग्रवाल ने कहा , ‘‘ बार और बेंच का संबंध एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. न ही एक को दूसरे पर प्राथमिकता हासिल है. दोनों मुक्त समाज के लिये अपरिहार्य हैं. ’’ 


(इनपुट भाषा)




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Tuesday, May 1, 2018

Ex-cji Rm Lodha Says The Current Situation Of The Judiciary Is Disastrous - पूर्व चीफ जस्टिस आरएम लोढ़ा बोले- न्यायपालिका की मौजूदा स्थिति ‘विनाशकारी’

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सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस जस्टिस लोढ़ा ने मंगलवार को कहा कि सर्वोच्च अदालत में मौजूदा हालात ‘विनाशकारी’ हैं। भले ही चीफ जस्टिस मास्टर ऑफ रोस्टर होते हैं लेकिन केसों का बंटवारा ‘उचित और संस्था के हित में होना चाहिए।’ न्यायपालिका की स्वतंत्रता से कोई समझौता नहीं किया जा सकता। चीफ जस्टिस को स्टेट्समैनशिप की खूबियां दिखाते हुए इस संस्थान को आगे ले जाना चाहिए। उन्हें अपने सहयोगियों को साथ रखना चाहिए।

पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी की किताब ‘अनीता गेट्स बेल’ के विमोचन के अवसर पर बोलते हुए जस्टिस लोढ़ा ने कहा, ‘हम सुप्रीम कोर्ट में जो दौर देख रहे हैं, कम के कम इसे विनाशकारी कहा जा सकता है। यह सहशासन (कालीजिएलिटी) बहाल करने के लिए उपयुक्त समय है। जजों का दृष्टिकोण और नजरिया अलग हो सकता है, लेकिन उन्हें सुप्रीम कोर्ट को आगे ले जाने के लिए एक साझा जमीन तलाशनी होगी। इसी से न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बहाल रखा जा सकेगा।

जस्टिस लोढ़ा को अपने कार्यकाल के दौरान उत्तराखंड हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस केएम जोसेफ के मामले में ऐसी ही स्थिति का सामना करना पड़ा था। तब एनडीए सरकार ने कॉलेजियम की सिफारिश से जुदा राय व्यक्त की थी। यही नहीं वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रह्मण्यम को शीर्ष अदालत के जज बनाने की सिफारिश पर फिर से विचार करने को कहा था। हालांकि बाद में सुब्रह्मण्यम खुद ही रेस से हट गए थे।

 लोढ़ा ने कहा, ‘मेरा हमेशा मानना रहा है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता से कोई समझौता नहीं किया जा सकता। कोर्ट के अगुआ होने के नाते चीफ जस्टिस पर इसे आगे ले जाने की जिम्मेदारी होती है। उन्हें सभी भाइयों एवं बहनों को साथ लेते हुए स्टेट्समैनशिप की खूबियां दिखानी चाहिए। हालांकि इस दौरान जस्टिस लोढा ने मौजूदा चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के नाम का उल्लेख नहीं किया।


उत्तराखंड हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस केएम जोसेफ को शीर्ष अदालत के जज के तौर पर प्रोन्नति देने के मामले में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की बुधवार को अहम बैठक हो सकती है। सरकार ने गत सप्ताह उनके नाम की सिफारिश पर फिर से विचार करने को कहा था। 

एक अधिकारी ने मंगलवार को कहा कि चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस जे चेलमेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन बी लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ की सदस्यता वाला कॉलेजियम इस मुद्दे और कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद की ओर से चीफ जस्टिस को लिखे गए पत्र पर विचार करेगा। 

जस्टिस जोसेफ उस पीठ के प्रमुख थे जिसने 2016 में उत्तराखंड में कांग्रेस सरकार को हटाकर राष्ट्रपति शासन लगाने के नरेंद्र मोदी सरकार के फैसले को खारिज कर दिया था।



सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस जस्टिस लोढ़ा ने मंगलवार को कहा कि सर्वोच्च अदालत में मौजूदा हालात ‘विनाशकारी’ हैं। भले ही चीफ जस्टिस मास्टर ऑफ रोस्टर होते हैं लेकिन केसों का बंटवारा ‘उचित और संस्था के हित में होना चाहिए।’ न्यायपालिका की स्वतंत्रता से कोई समझौता नहीं किया जा सकता। चीफ जस्टिस को स्टेट्समैनशिप की खूबियां दिखाते हुए इस संस्थान को आगे ले जाना चाहिए। उन्हें अपने सहयोगियों को साथ रखना चाहिए।


पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी की किताब ‘अनीता गेट्स बेल’ के विमोचन के अवसर पर बोलते हुए जस्टिस लोढ़ा ने कहा, ‘हम सुप्रीम कोर्ट में जो दौर देख रहे हैं, कम के कम इसे विनाशकारी कहा जा सकता है। यह सहशासन (कालीजिएलिटी) बहाल करने के लिए उपयुक्त समय है। जजों का दृष्टिकोण और नजरिया अलग हो सकता है, लेकिन उन्हें सुप्रीम कोर्ट को आगे ले जाने के लिए एक साझा जमीन तलाशनी होगी। इसी से न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बहाल रखा जा सकेगा।

जस्टिस लोढ़ा को अपने कार्यकाल के दौरान उत्तराखंड हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस केएम जोसेफ के मामले में ऐसी ही स्थिति का सामना करना पड़ा था। तब एनडीए सरकार ने कॉलेजियम की सिफारिश से जुदा राय व्यक्त की थी। यही नहीं वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रह्मण्यम को शीर्ष अदालत के जज बनाने की सिफारिश पर फिर से विचार करने को कहा था। हालांकि बाद में सुब्रह्मण्यम खुद ही रेस से हट गए थे।

 लोढ़ा ने कहा, ‘मेरा हमेशा मानना रहा है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता से कोई समझौता नहीं किया जा सकता। कोर्ट के अगुआ होने के नाते चीफ जस्टिस पर इसे आगे ले जाने की जिम्मेदारी होती है। उन्हें सभी भाइयों एवं बहनों को साथ लेते हुए स्टेट्समैनशिप की खूबियां दिखानी चाहिए। हालांकि इस दौरान जस्टिस लोढा ने मौजूदा चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के नाम का उल्लेख नहीं किया।






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जस्टिस जोसेफ के नाम पर फिर से विचार के लिए कॉलेजियम की अहम बैठक आज







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